बरसों बाद उभरी उन रद्दी के पुराने पीले पन्नों में दबी सिसकियाँ, जिन्होंने सालों बाद खुलकर साँसे ली.. क्या वो दबी हुई थीं एक आस में कि, कभी कोई उनको राहत की सास देगा! ....या कि वो गुमसुम सी पड़ी रहेंगी इसी तरह..न जाने कितने बरस.... फिरआखिरकार वो दिन आ ही गया..ओर वो उसी हाथो से उठाई गई जिन हाथों ने कभी उसे बुरी यादें समझके बेपरवा कर दिया था... ये वही आँखे थी जिसने उस समय की सिसकियों को दिल की गहराइयों में महसूस करने के बाद उन्हें शब्दों में बांधा था , पर सालों बाद जब उन सिसकियों को फिर से दिल की गहराइयों से महसूस किया गया तो एक नई प्रेरणा ने जन्म लिया...फिर एक प्रश्न उठा की , सिसकियाँ कभी किसी के लिये प्रेरणा कैसे हो सकती हैं.??? . जब भी कही कोई सिसकी सुनाई देती है तो वातावरण भी शोकाकुल हो जाता है.. पर ये सिसकियाँ कैसी है जो किसी के लिये प्रेरणा बन सकती है?..हाँ ये हो भी सकता कि उसकी नकारात्मकता ने दिल मे कुछ नया और बेहतर सोचने पर मज़बूर कर दिया हो "इतना आसान नही होता"... ऐसा बोलकर हम अपने अंदर की शक्तियों को दबा लेते है..परंतु नकारात्मकता भी सकारात्मकता को जन्म दे सकती है... अगर मन मे सच्ची लगन है कुछ कर गुजरने की...तो सब कुछ संभव हो जाता है..इसलिये एक हार के बाद हताश होने से तो अच्छा है कि हम उन सिसकियों से आगे बढ़ें.. एक सुनहरा भविष्य बुनने की तैयारी में जुट जाएं. भविष्य उज्ज्वल होकर ही रहेगा।
शुक्रवार, 20 मार्च 2020
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सिसकियाँ
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