शनिवार, 31 मार्च 2012

आशियां


क्या कहूँ में किसी से ,मेरे दिल क्या है ,एक छोटी-सी कशिश है ,सपनों का आशियाँ  है 
  
चाहत है ऐसे घर की ,जहाँ के दरवाज़ों  पर केवल वफ़ा और इमान दस्तक देते हों ,

 जहाँ की खिडकियों से केवल मुहोब्बत की हवा बहती हो .................................. 
   
 क्या कोई घर होगा ऐसा...???????????????

शनिवार, 24 मार्च 2012

मुसाफ़िर

शब्दों की खामोशिओं  में बहते चले गए,
           लम्हा लम्हा गिनते हुए शून्य में डूबते चले गए, 
      
                      मुसाफ़िर है ये कैसे !??    
      
          जाने किसकी खोज में...... खुदको गुमशुदा करते चले गए।

सिसकियाँ

बरसों बाद उभरी उन रद्दी के पुराने पीले पन्नों में दबी सिसकियाँ, जिन्होंने सालों बाद खुलकर साँसे ली.. क्या वो दबी हुई थीं एक आस में कि, क...