शब्दों की खामोशिओं में बहते चले गए,
लम्हा लम्हा गिनते हुए शून्य में डूबते चले गए,
मुसाफ़िर है ये कैसे !??
जाने किसकी खोज में...... खुदको गुमशुदा करते चले गए।
बरसों बाद उभरी उन रद्दी के पुराने पीले पन्नों में दबी सिसकियाँ, जिन्होंने सालों बाद खुलकर साँसे ली.. क्या वो दबी हुई थीं एक आस में कि, क...
काफी अच्छा लिखा है... पूरा हिंदी में क्यों नहीं लिखा?
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